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अपने बच्चों की मौत के बाद भी माता पिता ने किया कुछ ऐसा की प्रशंसा के हैं वह हकदार

अपने बच्चों की मौत के बाद भी माता पिता ने किया कुछ ऐसा की प्रशंसा के हैं वह हकदार

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आजकल किस समय किसको क्या हो जाए इसका बिल्कुल भी पता नहीं है। इसलिए कहा जाता है कि हर पल की खुशी से जीना चाहिए। क्योंकि किसकी मौत कब होजाए इज़के का एहसास किसी को भी नहीं है। ऐसा जरूरी नहीं है कि सबसे पहले मौत बुजुर्ग इंसान की हो। आजकल जवान लोग बुजुर्गों से जादा मर रहे हैं। कोई भी माता पिता नहीं चाहते होंगे कि उनके बच्चों की मौत उनसे पहले हो जाए और अगर ऐसा होता है तो वह माता-पिता के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट जाता है उन्हें कभी कुछ समझ नहीं आता कि वो आगे भविष्य में क्या करेंगे और बिना अपने बच्चों के सहारे कैसे जियँगे। कुछ लोग तो इसी टेंशन में आकर सुसाइड कर लेते हैं, कुछ लोग इस बीमारी की वजह से मर जाते हैं। किसी के बच्चे की मौत हो जाने के बाद उसके माता-पिता का हौसला टूट जाता है। लेकिन आज हम जिस माता पिता के बारे में आपको बताने वाले हैं उनकी बारे में पढ़ने के बाद आपके साथ उनके हौसले और जज्बे को सलाम करेंगे।

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7 युवा बच्चे अपनी पढ़ाई की परीक्षा देने जा रहे थे। तभी अचानक से उनकी कार फ्लाईओवर से टकरा गई और उनकी गाड़ी ऊपर से नीचे रेलवे ट्रैक के पास जाकर गिर गई। उसमें से दो बच्चों के नाम के संचित छावड़ा जिसकी उम्र 19 साल की थी दूसरी का नाम रितु सिंह जिनकी उम्र 18 साल की थी उनके साथ 4 और बच्चे थे जो सब कार ऑक्सीडेंट में मारे गए।

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जब इसकी खबर उनके माता-पिता को पहुंची तो जैसे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई और वह सदमे में चले गए। इस तरह से रिएक्शन देना सही है क्योंकि किसी भी इंसान के साथ अगर ऐसा होगा तो उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही रहेगी। एक युवा बच्चे को खो देना किसी भी माता-पिता के लिए सबसे बड़ा दुख है। परंतु अपने बच्चों को खो देने के बाद भी संचित, रितु के माता पिता ने ऐसा काम करके दिखाया जिसके बाद वह सलाम करने के हकदार है। संचित के पिता का नाम राजकुमार छाबड़ा है उन्होंने कहा कि मेरा बेटा तो इस दुनिया में नहीं रहा, इसका मुझे बेहद दुख है अब यह दुख कभी कम नहीं हो सकता है। परंतु मैं चाहता हूं कि मैं उसकी आंखें दान करूँ। ताकि उसकी इन आंखों से कोई दूसरा इंसान इस खूबसूरत दुनिया को देख सके। मुझे यह सोच कर ही शांति मिल जाएगी की मेरा बेटा तो नही रहा परंतु उसकी आंखे इस दुनिया में है।

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यही सोच रितु के पिता ने भी दिखाई। इसके पिता का नाम मलखान सिंह है। उन्होंने भी अपनी बेटी की आंखें दान कर दी। आंखों में आंसू जरूर थे परंतु इस बात की शांति भी थी कि मेरी बेटी दुनिया में नहीं रही परंतु उसकी आंखें इस खूबसूरत दुनिया को देख रही है। मेरी बेटी आंखों की वजह से इस दुनिया में जिंदा रहेगी। यह आंखें जिसको भी मिलेगी मैं उसको मिलने हमेशा जाता रहूंगा। मुझे इससे ही तसल्ली मिल जाएगी की इन आंखों से वो अपने पिता को देख रही है।

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आपको ये बात सुनकर और हैरानी होगी कि संजीव के पिताजी उसकी सिर्फ आंखें ही नहीं बल्कि उसका पूरा अंग दान करना चाहते थे। परंतु जब तक ngo वाले वहां पर आए तब तक उनके शरीर के सभी अंगो ने काम करना बंद कर दिया था। फिर आंखें ही काम कर रही थी। जिसके लिए संचित पिता ने तुरंत हां कर दी और बिना कुछ सोचे समझे उसकी आंखें दान करने का वादा कर दिया।

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शायद आप सब इस बात से जानकर होंगे कि भारत में हिंदू धर्म के लोग इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं है कि किसी भी मृत इंसान के शरीर के अंगो का दान कर दिया जाए। क्योंकि उन लोगों का ऐसा मानना है कि मृत के अंगो का दान कर देने के बाद उस इंसान के शरीर को शांति नहीं मिलती है। इसी बात पर संचित और ऋतु के पिता ने कहा, कि इन अफवाहों की वजह से ही लोग सहायता के लिए आगे नहीं आते हैं। जिनको अंगो की जरूरत होती है उन्हें अंग नहीं मिल पाते हैं। क्योंकि लोगों के यह अफवाहें किसी के काम नहीं आती है। इस वजह से उन्होंने सभी से अनुरोध किया कि इन अफवाहों पर विश्वास न करें और लोगों की मदद करने के लिए आगे आए। अपने अंगों को दान करें। अपनी आंखों को दान करें। ताकि आप के अंगो से और आंखों से ऐसा इंसान इस ख़ूबसूरत दुनिया को देख सकता है।

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